रविवार, 13 फ़रवरी 2011

काशी का यात्रा वृतांत



समयः 31-11-2010
स्थानः काशी विद्यापीठ वाराणसी
मौकाः पी.एच.डी. प्रवेश परीक्षा
एतिहासिक और धार्मिक नगरी काशी की ब्रह्मा मूहर्त की मनमोहक सुबह थी दीपावली पूर्व की भीड़ रेलवे स्टेशन पर स्पष्ट नजर आ रही थी। उसी भीड़ में मैं और मेरा दोस्त सौरभ भी रात तीन बजे कानपुर से चल वनारस जタशन पर उतरे। गुनगुनी सर्दी के साथ बूंदे गिर रही थी। दोनों ने ट्रेन से उतरकर सर्वप्रथम स्टेशन का पहला नजारा देखा ........स्टेशन तो चौकस है, हां अपने यहां जैसी ज्यादा भगदड़ नही है। ......... और आपसी निर्णय लिया की अनजान शहर है जब तक होटल तलाशोगे सुबह हो जाएगी। इसलिए सीधे से वनारसी रात के लिए सबसे अच्छा स्थान स्टेशन परिसर ही है। इसलिए सुबह छह बजे का अलार्म लगा और वहीं बैग में पड़ा चादर-साल निकाल कर वहीं पर सो लिए। स्टेशन की उद्‌घोषणाए कानों में गूंज रही थी मन में कई तरह के सवाल और प्रवेश परीक्षा की चिंता थी, लेकिन थकावट के कारण कब नींद आ गई और कब सुबह हो गई मालूम नही हुआ।
अचानक मोबाइल में लगा अलार्म बजता है.. उठों भाई टाइम हो गया। चादर वादर पुनः बैग में ठूसने के बाद प्लेमफार्म से बाहर निकले। बाहर निकले ही एक दातून वाला दुकान लगाए हुए था और अखबार हाकर भारी मात्रा में मौजूद थे।
मैं और मेरा दोस्त fress होने पर चर्चा कर धीरेल-धीरे स्टेशन से दूर हो रहे थे, स्टेशन परिसर में ही एक सामुदायिक शौचालय था लेकिन भीड़ अधिक होने के कारण दोनों आगे बढ़ गए और चाय और खोमचों वालों से पूछताछ करने लगे।
चौराहे से कुञ्छ ही दूरी पर एक अन्य शौचायल था जहां दोनों ने वनारसी स्नान किया। यहीं पर एकञ् अन्य परीक्षार्थी से भेंट हो गई नाम तो पूछा नही, लेकिन वह समाजशास्त्र क लिए प्रवेश परीक्षा देने आया था।
आप कहा से ?
कानपुर से
ट्रेन में मैंने आप दोनों को देखा था, मैं इलाहाबाद से बैठा हूं
ये बताइए कि यहां से काशी विद्यापीठ कितनी दूरी पर है?
विद्यापीठ में ही न परीक्षा है............ वो तो करीब म पैदल दूरी पा है.. आप ऐसा करो यहां से चौराहे पर जाइएगा और सीधे निकलने पर बस पांच मिनट में पहुंच जाएगे।
आपका केन्द्र कहा है दोस्त? मेरा से बहुत दूर हा
ठीक है जी फिर मिलते है।
पवित्र काशी के पावन जल से स्नान के बाद बाजू के चौराहे की ओर बढ़ दिए। रिमझिम बूंदे गिर रही थी चौराहे पर ही एक धर्मशाला दिखा और कुछ रिタ शे
वाले वहीं ग्राहकों का इंतजार कर रहे थे। उस रोड को विद्यापीठ रोड ही कहते है...
इशारे से
ओ ए काशी विद्यापीठ............
हां साहब चलिएगा
कितने रुपए?
दे देना सुबह का टाइम है
बता तो दे
क् रुपए । किराए से समझ आया कि परिसर काफी करीब है
भ् दूंगाअरे बहौनी की टाइम है साहब..... चलो ठीक है
काशी में हमारा रिタशा खस्ताहाल सडक़ पर हिचकोले खाने लगा। पलक छपकते ही महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ का गेट नंबर 1 नजर आया......सौरभ देख ये है..
हां ठीक है स्टेशन के पास ही है.. लौटने ने ट्रेन पकडऩे में सहूलियत रहेगी।
साहब जी उतरना कहां है?
गेट पर.... हां कौन से गेट पर
कितने गेट है
तीन-चार है
मेन पर उतार दो।
बिहारी टाइप रिタ शेवाले ने मेन गेट नं 2 पर एकदम सटे मठ मंदिर के पास जाकर उतार दिया।
भगवान को नमन करने के बाद...... चलो चाय पी लेते है हां सर्दी भी लग रही हैदोनों ने पूरी मेहनत से चारों दिशाओं में नजरें दौड़ाई लेकिन कोई सही-सलामत ढाबा या रेस्टोरेन्ट नही टकराया, फिर タया चाय तो पीनी ही थी गेट के सामने futpat पर बिजली के खंभे से सटी दुकनिया पर जा पहुंचे। एक भले मानुष हुन्डे में चाय की चुस्कियों के साथ अमर उजाला चाट रहे थे चाय के आर्डर के बाद हम भी.......................
महान मालवीय और शिव प्रसाद गुप्त संस्थापक विद्यापीठ के गेट के सामने चुस्कियों और अखबार पढने के साथ जर्जर परिसर की चाहरदिवारी पर नजर पड़ी। दुकनिया के ठीक सामने ही परिसर में बने एक छोटे कमरेनुमा भवन में पुराना सा शिलालेख लगा था जिसमें उक्तञ् भवन का निर्माण वर्ष उकेरा गया था।
सौरभ भाई.. हम लोग भी महान हो गए, कैसे? इतने प्राचीन और एतिहासिक विवि ने हम लोगों को पी.एच.डी. कराने के लिए बुलाया है यार....
लेकिन तुमने गौर किया タया?
इस एतिहासिक परिसर के इर्दलृगिर्द कोई शिक्षात्मक महौल नही है लोगों ने परिसर के इअंदर अवैध कजे कर लिए हैं। गेट न. १ञ् से दो तक स्थानीय लोगों ने रोड और परिसर के बीच futpath पर कजे कर दो-दो तीनलृतीन मंजिल के मकान बना लिए है।

पहली नजर में विद्यापीठ का परिसर जचा नही जैसी कल्पना की थी वैसा तो बिल्कु नही.....
परिसर का मेन द्वार जर्जर
परिसर के बाहर झग्गियों से जैसा महौल
पीले रंग की पुताई और रखरखाव बिन भवन से दरिद्रता का संके दे रही थी।
सौरभ की घड़ी प्रातः के नौ बजा चुकी थी। सामने बने मठ से ब्राह्‌ण देव की शिव आरती स्पष्ट सुनाई और दिखाई दे रही थी। दोनों कनपुरिये दुकनिया से उठकर परिसर केञ् निर्माणधीन और अस्त व्यस्त गेट न. दो विद्यापीठ में प्रवेश करते हैं....गेट के बांई तरफ कुञ्छ होमगार्ड पान-मसाला खा रहे थे और कुञ्छ हाथ सुकोडे़ हुए गप्पे हांक रहे थे। परिसर के अंदर घुसते ही इतिहास विभाग का भवन दिखाई देता है गेट और भवन के बीच में गोलाकार ताड़ के वृक्षों के बीच लोहे की जंग लगी रेलिंग में कैञ्द राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और शिवप्रसाद गुप्त की अर्ध आदमकाय स्मृति मूर्तिया झलकती नजर आती हैं। गोलाकार स्मृति स्थल के बाई ओर बैंक और डाक घर है। मूर्तियों के ठीक नीचे लगे शिलालेख उक्तञ् विवि व स्थान की उपयोगिता दर्शा रहे थे लेकिन महान पुरुषों केञ् इर्द-गिर्द रद्दी कागज, पान मसाला और कटील घास दुर्दशा विवि की दुर्दशा का स्वयं व्याチयान कर रहे थे। मूर्तियों के ऊपर लगे यूज बल्ब मन को पीड़ा दे रहे थे, ये देखने के बाद मै दाईं ओर बढ़ गया। वहां प्रशासनिक भवन केञ् सामने एक बोर्ड पर रैगिंग केञ् लिए व धूम्रपान केञ् लिए निर्देश दिए हुए थे तथा ताड़ केञ् पेड़ पर परीक्षा सबंधी सीटिंग प्लान की प्रति चस्पी हुई थी। लिस्ट में सौरभ का रोल नबर दिया हुआ था तथा नीचे नोट मे लिखा था कि पत्रकारिता से सबंधित परीक्षार्थी प्रबंधक संकाय से संपर्कञ् करें। यह पढ कर हम लोग बाईं ओर घूमने की उद्देश्य से चल दिए।

चार कदम की दूरी पर खस्ताहाल एक प्राचीन कुञ्ंआ जिसमें पुरानी काशी की झलक दिखाई दे रही थी लेकिन जर्जर स्त्रोत में कई पेड़ अंकुञ्रित हो चुकेञ् थे सीढि़या क्षतिग्रस्त थी कुंञ्ए केञ् ठीक सामने शिक्षकों का स्टाप रूञ्म टाइप का भवन था परन्तु यहां कुञ्छ साइकिल व बाइक खड़ी हुई थी। कुञ्एं केञ् पास ही एक आदमकाय सड्डेञ्द मूर्ति एक मैदान में अपनी उपस्थित दर्ज करा रही थी। पास जाकर देखने का मन तो था लेकिन मैदान की घास और पानी की हल्की बूंदों ने रोक दिया। मैदान केञ् सामने ही हास्टल और जनसंपर्कञ् कार्यालय था। यहां से हम लोग वापस गोलाकार स्मृति स्थल केञ् पास लौट आए। अब यहां पर कुञ्छ अन्य परीक्षार्थी जुट चुकेञ् थे घड़ी देखी तो नौ बजकर दस मिनट हुआ था इसलिए सामने टूटे गेट से दिखाई दे रहे विवि केञ् परिसर में जाने लगे। गेट केञ् पास ही बिना पर्दा का पुरुष मूत्रालय था और गेट केञ् सटे ही एक निजी अस्पताल और भैसों का चट्टा जो महौल में अधिक गंदगी ड्डैञ्ला रहा था। आगे बढ़ते ही पत्रकारिता, हिन्दी विभाग और पड़ता है बाईं ओर विवि प्रशासन की कुञ्छ गाडिय़ा खड़ी थी।

परिसर केञ् चौराहे पर कुञ्लपति का आवास था और उसी रास्ते थे पर भारत केञ् पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद द्वारा समर्पित किए गए छात्रावास था। छात्रावास केञ् सामने बड़ा सा मैदान था जहां शायद क्रिञ्केञ्ट की पिच का निर्माण हो रहा था पास बड़ीलृबड़ी लगभग आधा दर्जन टंकिया पड़ी हुईं थी। आगे जाने पर फिजिकल विभाग था। जहां डा. भीम राव अबेडकर की मूर्ति स्थापित थी पास ही एक शिलालेख गड़ा हुआ था जिसमें उक्तञ् विभाग केञ् नए भवन केञ् हाल बनने की बातें उकेञ्री गई थी

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